श्री दधिमती मातेश्वरी का छंद ( Dadhimati Mata Ji Ka Chand )

छन्द गुन दधिमत का गाता, सकल की साय करो माता ।
गोठ एक मांगलोद माई ,बिराजे दधिमती महा माई । ।
जंगल में एक मन्दिर आसमानी उसी को जाने सब जनि ।
छात्र बिराजे सोहनो, चार भुजा गल माल ।
कानन कुंडल झील मिले , माता सिंह असवारे। ।
बाजे नोपत दिन राता, सकल की साय करो माता । छन्द ।


दधिमती महा माई , महर कर गोठ नगर आई ।
ग्वालो चरावत है गाई,कहयो तू बोली मत भाई । ।
जब तब बाहर मै आउ, लोक में सम्पति बर्पाऊ ।
दधिमती बहार जब निसरी , धुंध भई दिन रैन । ।
हुई गरज़ना सिंह की , गउ भिदक गई भागी ।
ग्वालो गाऊ घेर लाता , सकल की साय करो माता । छन्द।


ग्वालो हो हो कर रो यो , वचन देवी को भूल गयो ।
तब माता बहार नही आई , गुप्त एक मस्तक पुज़वाई । ।
दधिमत माता की जो पूजा करे ,जो कोई नर नार ।
निश्चय हो कर धरे जो धियान ,तो बेडा हो जावे पार । ।
दुःख दरिद्री दूर हो जाता , सकल की साय करो माता । छन्द ।


परचों एक साहूकार पायो माता के मन्दिर चुनवायो ।
पोल एक सूरज के सामी , कुण्ड का अमृत है पांणी । ।
अधर खम्ब एसो बनियो , जानत है सब जाण ।
कल युग में छिप जायसी , सत युग की से ना ण । ।
कलि में करत लोगा बा ता, सकल की साय करो माता । छन्द ।


परचों एक पाली नो रान्ना,उदय पुर मेवाड़ सब जानो । ।
कारज उनका भी सिद्ध किना , वचन संनान पुत्र देय दिना ।
सुतो सपनो एक आयो , जाग सके तो जाग । ।
देऊ गड़चित्तोड़ को ,मेंटू थ्हरे दिल के दाग ।
द्रव्य एक जुना भी पाता, सकल की साय करो माता । छन्द ।


रात को रांणा उठ जागियो , माता के पाव लगियो ।
आप को अखिल बचन पाऊ,देश में मन्दिर चुनवाऊ । ।
तब देवी का हुकम सु ,आयो देश दिवाण ।
मन्दिर चुनवाओ भूप सु स , उचो कियो निवाण । ।
कुण्ड की पेडी बंधवाता , सकल की साय करो माता । छन्द ।


भक्त नित सेवा ही करता ,धियान दधिमत माता का धरता ।
दशरावो मेलो भरे ,चैत्र आसोजा मांय |
देश देश के आवे यात्री , पुरे मन कि आस |
अन्न धन दिजो जी माता, सकल कि साय करो माता |छंद|


दायमा ब्राम्हण यह गाता, खींवसर नगरी मे रहता |
मात को नंद छंद गायो, मात के चरणा चित्त लाग्यो |
जो जण गावे अरु सुने , निस दिन धरे जो ध्यान |
गुरू बडा गुणवान है, मुलचंद महाराज |
जोडकर जेठमल गiता,सकल की साय करो माता । छन्द ।

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